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एक कन्यादान ऐसा भी - मन की बात नेहा के साथ

कुछ परिस्तिथिया अग्नि-परीक्षा जैसी होती है, जिन्हे पार करने की हिम्मत करनी ही पड़ती है..... कभी कभी बेहतर भविष्य कुछ अग्नि परीक्षाओं से हो कर गुजरता है............!! 







दीपांकर जी के यहाँ आज कल बहुत चहल पहल है, शादी वाला घर जो है। रिश्तेदारों की भीड़ भाड़, कई लोगो का घर में आना जाना !! ये सब उस घर में काम करने वाली रुबीना बहुत ध्यान से भी देख रही थी !! रुबीना को आज ही घर के कामो के लिए दीपांकर जी की पत्नी शालिनी जी ने रखा है, रुबीना की उम्र ये ही कुछ 40 साल के लगभग होगी। शादी वाले घर में काम की कोई कमी नहीं होती इसीलिए एक अचानक शालिनी जी को लगा कि कई कामो को निपटाने के लिए एक और मदद के हाथ चाहिए तो बस आज ही रुबीना का घर में पहला दिन था !!


रुबीना काम किये जा रही थी और घर में लगी रौनक की तरफ भी आकर्षित थी !! रुबीना समझ गयी थी कि घर की बेटी की शादी है । बर्तन धोते हुए रुबीना ने शालिनी जी को पूछते कहा, "आपकी बेटी की शादी है क्या दीदी" ????
"हाँ, कविता नाम है उसका" - बड़ी सी मुस्कान के साथ जवाब देते शालिनी जी वहां से चली गयी !! 


घर पर शादी की तयारियों में कोई कमी नहीं रखी जा रही थी। हर एक चीज़ का इंतज़ाम दीपांकर जी खुद अपनी देख रेख में करवा रहे थे !! चारो और अच्छी सजावट, हसी ठिठोली, मिठाईया, उपहार, अच्छा खाना, कही नाच गाना और कही रिश्तेदारों की बातों से घर जी उठा था !! शादी बस 2 दिन बाद की थी और रुबीना को 2 दिन के लिए यही रहना था !! 


रुबीना जब जब कविता को देखती, बस ये ही सोचती कि कितनी खुशनसीब है कविता जो इतने अच्छे माँ-बाप मिले है, शादी की क्या खूब त्यारियां चल रही है, कही कोई कमी की गुंजाइश नहीं है !! शाम को जब रुबीना कविता को खाना देने उसके कमरे में गयी तो 3 साल के बच्चे के साथ कविता को देखा जिसे कविता खाना खिला रही थी.......

"मम्मा, हम नए घर क्यों जाएंगे......" - उस बच्चे ने कविता से सवाल करते पूछा। 
कविता बस मुस्कुरा कर उसके सिर पर हाथ फेरती उसे खिलाने लगी !!


पर रुबीना ये सब देख हैरान सी थी कि कैसे ये छोटा बच्चा कविता को मम्मा बोल रहा था !! और दोनों में लगाव भी माँ-बेटे जैसा ही लग रहा था !! रुबीना बस वहां खाना रख कर वापिस आ गयी !! अब अगले दिन ही शादी थी, आज किसी रिश्तेदार को कुछ ऐसी बात करते रुबीना ने सुना कि रुबीना के होश उड़ गए.........!!

"कौन कहेगा कि कविता इस घर की बेटी नहीं, बल्कि बहु है !! सच्च दीपांकर जी और शालिनी जी का दिल बहुत बड़ा और साफ़ है" - एक रिश्तेदार ने दूसरे रिश्तेदार से बात करते कहा !!

बस इतना ही सुनने की देर थी कि रुबीना समझ गयी थी कि वो छोटा बच्चा कविता को मम्मा क्यों बोल रहा था !!
कविता दीपांकर जी और शालिनी जी की बेटी नहीं बल्कि बहु है, सुन रुबीना हैरान थी !! पर ये शादी क्यों भला.......!! मन में कई सवाल उठे पर किसी को पूछ भी नहीं सकती थी आखिर रुबीना बस वहां एक काम करने वाली थी, पारिवारिक बातों में पड़ना ठीक नहीं सोच रुबीना ने बात को वही छोड़ दिया !!


रात में रुबीना ने शालिनी जी को अकेले में दिवार पर एक टंगी फोटो के सामने रोते देखा तो रुबीना से रहा नहीं गया, रुबीना झट से शालिनी जी के पास जा उन्हें चुप करवाने लगी, शालिनी जी भी भावनाओ में बह रुबीना से लिपट रोने लगीं !! 

"क्या हुआ दीदी, आप इतना क्यों रो रहीं है, कुछ बात हुई क्या" - रुबीना ने शालिनी जी को पूछा। 

"आज का ये एहसास कुछ अलग ही है रुबीना, ये दिवार पर लटकी फोटो मेरे बेटे की है जिसका एक साल पहले देहांत हो गया था, कविता इसकी पत्नी है और दोनों का छोटा सा बेटा अंश है !! पर बेटे की मौत के बाद जैसे हम सब जीना भूल गए, कविता ने तो जैसे हसना बोलना खाना पीना सब छोड़ दिया था !! बड़ी मुश्किल से कविता को हम सबके साथ ने सामान्य किया !! लेकिन इतनी बड़ी ज़िंदगी और एक बच्चे की जिम्मेदारी, आखिर बच्चे को भी तो बाप की जरुरत है...... इसलिए हमने ये कठिन फैसला लिया कविता की दूसरी शादी का फैसला !! जिसके लिए कविता बिलकुल राज़ी भी नहीं थी लेकिन जैसे तैसे अंश के लिए हमने उसे राज़ी किया है !! बस अब भगवान् से ये ही विनती है कि अब उसकी ज़िंदगी में कोई गम न आये" - शालिनी जी ने रोते हुए रुबीना को बताते कहा। 

रुबीना भी मानो बस रो ही पड़ती कि बस खुद को बहुत संभाल रही थी !! और शालिनी जी को भी हिम्मत देते रुबीना सहलाये जा रही थी !!


"आप बहुत नेक और महान काम कर रही है दीदी, मैं समझ सकती हूँ कि ये कितना मुश्किल है !! आखिर एक साल पहले आपने अपना बेटा खोया और कल शादी होते ही बहु और छोटे से पोते पर हक़ भी खो देंगी !! अपने बेटे की निशानी अंश को भी विदा कर देंगी पर यकीन करिये दीदी इससे अच्छा काम और कोई हो नहीं सकता !!" - इतना बोलते रुबीना भी खुद को रोक नहीं पायी और रो ही पड़ी !!


"और दीदी आपके ये आंसू कविता और अंश को भी कमजोर बना देंगे, इन्हे पोछ कर एक मुस्कुराते चेहरे से इस शादी की भागीदार बनिए !!" - रुबीना ने शालिनी जी को हिम्मत देते कहा। 


और शालिनी जी भी मुस्कुराते चेहरे से कमरे से बाहर आ, शादी की भागदौड़ में फिर से शामिल हो गयीं !! पर रुबीना के आँख के आंसू अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे !! शालिनी जी के मन की बात और उलझन रुबीना महसूस कर रही थी........ कितनी हिम्मत चाहिए इतना कठिन फैसला लेने तक में और यहाँ तो ये कठिन फैसला निभाया जा रहा था !! 


उधर कविता के कमरे की लाइट देर रात तक जलती रही.......... रुबीना समझ गयी थी कि ये रात कविता के लिए भी आसान नहीं थी !! भला नींद कैसे आ जाती आज !! 


अगले दिन जब शादी की हर रसम को पूरा किया गया और विदाई की रसम की बारी आयी, कविता भी अपने सास-ससुर के आगे हाथ जोड़ फुट फुट कर बिलख पड़ी, मानो जैसे उन्हें छोड़ कर जाना ही न चाहती हो जैसा हर लड़की की आँखों में दर्द दिखता है अपने माँ-बाप को छोड़ कर विदा होने का, बिलकुल वही दर्द कविता की आँखों से अपने सास-ससुर के लिए झलक रहा था !! आज इन्ही सास-ससुर ने उसे अपनी बेटी बना कन्या-दान जो किया था !! 








आज कविता इस घर की बहु नहीं बेटी बनी थी और ये विदाई की घड़ी और भी नाज़ुक और संवेदनशील थी !!


कविता को तो विदा कर दिया था लेकिन दीपांकर जी और शालिनी जी का तो घर आज खाली हो गया था......... बहु और पोते को विदा कर शालिनी जी एक कोने में कुछ देर के लिए अकेले बैठ गयी !! लेकिन इतना मुश्किल फैसला निभाने वाली शालिनी जी आखिर कमजोर कैसे पड़ सकती थी !! बस आंसू पोछ उठी और रुबीना के पास आ उन्हें हिम्मत देने के लिए उसका धन्यवाद करते उसको खूब सारे उपहार, नए कपडे और भोजन दे अब अपने घर सबसे मिल कर आने के लिए कहा, आखिर रुबीना भी तो 2 दिन से अपने घर नहीं गयी थी !!


रुबीना भी वहां से निकल पूरे रास्ते बस भारी मन से आंसू पोछती रही............!!


पर कहते है न कि कुछ कठिन फैसले अभी के दुःख और उमरभर के सुख जैसे होते है, उन्हें स्वीकारने में ही शायद भलाई होती है......। 

Thank You.........



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